Saturday, November 21, 2009

सिर्फ़ विपन्न विस्मयता ही हमारे खून में खेल रचाया करती है



व्यक्तिगत रूप से मेरा ठोस यकीन है कि जीवनानन्द दास बांग्ला कविता के शीर्षस्थ कवि हैं - किसी भी कालखण्ड के. ठाकुर रवीन्द्र से भी बड़े और सुकान्त भट्टाचार्य से भी. हालांकि उन्हें उनकी कविता ’वनलता सेन’ (बौनोलता शेन) के लिए सबसे अधिक ख्याति मिली पर उनकी अनेकानेक रचनाएं मुझे आज भी हैरत और उद्दाम प्रसन्नता से भर देती हैं.

उनकी एक कविता आज लगा रहा हूं. जल्द ही जीवनानन्द दास के जीवन और उनकी रचनाओं को लेकर एकाध पोस्ट लेकर हाज़िर होता हूं. इस ख़ास कविता का मेरे लिए बहुत बड़ा महत्व इस मायने में है कि घनघोर अवसाद के जब तब आने वाले समयों में इस रचना ने मुझे बचाया है.


एक दिन आठ साल पहले

जीवनानन्द दास
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सुना चीर फाड़ कर
ले गए हैं उसे,
कल फागुन की रात के अन्धेरे में
जब डूब चुका था पंचमी का चांद
तब मरने की उसे हुई थी साध,
पत्नी सोई थी पास - शिशु भी था,
प्रेम था - आस थी -
चांदनी में तब भी कौन सा भूत देख लिया था
कि टूट गई थी उसकी नींद?
इसी लिए चला आया चीर-फाड़ घर में नींद लेने अब!
पर क्या चाही थी उसने यही नींद!

महामारी में मरे चूहे की तरह
मुंह से ख़ून के थक्के उगलता, कन्धे सिकोड़े, छाती में अन्धेरा भरे
सोया है इस बार कि फिर नहीं जागेगा कभी एक भी बार.
जानने की गहरी पीड़ा
लगातार ढोता रहा जो भार
उसे बताने के लिए
जागेगा नहीं एक भी बार
यही कहा उसे -
चांद डूबने पर अद्भुत अन्धेरे में
उसके झरोखे पर
ऊंट की गरदन जैसी
किसी निस्तब्धता ने आकर.
उसके बाद भी जागा हुआ है उल्लू.
भीगा पथराया मेंढक उष्ण अनुराग की कामना से
प्रभात के लिए दो पल की भीख मांग रहा है.

सुन रहा हूं बेरहम मच्छरदानी के चारों ओर
भिनभिनाते मच्छर अन्धेरे में
संग्राम करते जीवित हैं -
जीवन स्रोत को प्यार करके.

ख़ून और गन्दगी पर बैठकर धूप में उड़ जाती है मक्खी,
सुनहली धूप की लहर में कीड़ों का खेल
जाने कितनी कितनी बार देख चुका हूं.
सघन आकाश या किसी विकीर्ण जीवन ने
बांध रखा है इनका जीवन,
शैतान बच्चे के हाथ में पतंगे की तेज़ सिहरन
मरण से लड़ रहा है,
चांद छिपने पर गहरे अंधेरे में
हाथ में रस्सी लेकर अकेले गए थे तुम अश्वत्थ के पास
यह सोचकर कि मनुष्यों के साथ में
कीड़े और पक्षी को जीवन नहीं मिलेगा!

अश्वत्थ की शाख ने
नहीं किया प्रतिवाद? क्या जुगनुओं के झुण्ड ने आकर
नहीं किया सुनहले-फूलों का स्निग्ध झिलमिल?

थुरथुरे अन्धे घुग्घू ने आकर
क्या नहीं कहा - "बूढ़ा चांद बाढ़ में बह गया क्या?
बहुत अच्छा!
अब दबोच लूं एक दो चूहे."
बांचा नहीं घुग्घू ने आकर यह प्रमुख समाचार?
जीवन का यह स्वाद - पके जौ की गन्ध सनी
हेमन्त की शाम -
असह्य लगी तुम्हें
तभी चले आए हो ठण्डे घर में कुचल कर मरे चूहे के रूप में.

सुनो तब भी इस मॄतक की कहानी -
यह किसी नारी के प्रेम का चक्कर नहीं था
विवाहित जीवन की चाह थी
ठीक समय पर एक जीवनसंगिनी
ख़ुद ही आ गई.

ग्लानि से हड्डी टूट जाए या दुख से मर जाए
ऐसा कुछ नहीं था उसके जीवन में
जो चीर-फाड़ घर में
तखत पर चित
आ लेटता.

इन सबके बाद भी, जानता हूं
नारी का हृदय, प्रेम, शिशु, घर ही सब कुछ नहीं है
धन नहीं, मान नहीं, सदाचार ही नहीं
सिर्फ़ विपन्न विस्मयता ही हमारे
खून में खेल रचाया करती है,
क्लान्ति हमें थकाती है,
लेकिन क्लान्ति वहां नहीं है
इसलिए लाशघर की
मेज़ पर चित सोया है.
तब भी रोज़ रात को देखता हूं
आहा ...
अश्वत्थ की डाल पर थरथर कांपता अन्धा घुग्घू -

आंख पलटाए कहता है -
"बूढ़ा चांद! बाढ़ में बह गया क्या?
बहुत अच्छा!
अब दबोच लूं एक दो चूहे."

हे आत्मीय पितामह आज करो चमत्कार
मैं भी तुम्हारी तरह बूढ़ा हो पाऊं
और इस बूढ़े चांद को
पहुंचाऊं कालीदह की बाढ़ के पार ...

हम दोनों मिलकर शून्य कर जाएंगे जीवन का प्रचुर भंडार.

(यह अनुवाद समीर वरण नन्दी का है. अलबत्ता मैं यहां हिन्दी के वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल द्वारा किया गया अनुवाद लगाना चाहता था पर अपनी किताबें खंगाल चुकने पर मुझे अहसास हुआ कि किन्ही सज्जन को जीवनानन्द दास पर ज्ञानपीठ द्वारा छापा गया वह छोटा सा मोनोग्राफ़ ज़्यादा पसन्द आ गया होगा.)

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Friday, November 20, 2009

एक दिव्य जलयात्रा



रानी जयचन्द्रन की दो कविताओं के अनुवाद आप 'कबाड़ख़ाना' पर पहले भी देख चुके हैं । उनकी हाल ही में प्रकशित कविता पुस्तक Echoes of Silence में बहुत अच्छी कवितायें हैं। आज इसी संग्रह से एक कविता The Celestial Voyage का अनुवाद प्रस्तुत है।


एक़ दिव्य जलयात्रा / रानी जयचन्द्रन

जब प्रसन्नता से परिपूर्ण मैं
अग्रसर हूँ खेती हुई एक नाव
तो सुनाई दे रही है एक लयबद्ध ताल
क्या यह प्रवाह से भरे जल की ध्वनि है ?
अथवा आवाज है मेरे भीतर हिलोरें मारते आह्लाद की ?
क्या यह स्पंदन है मेरे हृदय का ?
या फिर
कोई आलाप है हाँफते हुए मन - मस्तिष्क का ?

मन्द शीतल हवा
जो संदेशवाहि्का है
पुष्पित होते चंपक की भीनी सुवास की
वही इस क्षण उर्ध्वमान किए जा रही है अंतरात्मा को
स्वर्गिक ऊँचाइयों की ओर
और जिसने मेरे मस्तक पर सजा दिया है
सुबह - सुबह की धुन्ध का दिपदिपाता मुकुट।

घास चरते मृग , चह - चह करते विहग
गीत गाती कोकिल , प्रस्फुटित होते पुष्प
नर्म - नाजुक तृण , छाया बाँटने वाले वॄक्ष
कुमुद की पंखुड़ियों पर जमे हुए तुहिन कण..
समूचे दृश्य को बना रहे हैं देवताओं का उपवन - देवोद्यान
जिसमें अवतरित हो रहा है
स्वर्गिक आभा का सहज सतत समुच्चय।

कोहरे में स्नात सघन वन प्रान्तर से
झाँक रहे हैं सुनहले किरणों के पुंज
रुपहली ढलानों पर फिसल रहा है रश्मित आलोक
जिसकी छुवन से पिघल रही है जमी हुई ओस
और छितरा रही है छोटी- छोटी बूँदें
जो समीरण के वेग में प्रशान्ति भर कर
इस सुन्दर दृश्य को बनाए जा रही हैं एक रहस्यपूर्ण संसार।

मैं सुन रही हूँ...सुन रही हूँ
मन्द हवा की आहट - सरसराहट
बहुत स्पष्ट है
अपनी ही लहरों से भरी यह लोरी
जो मेरे अशक्त अंतस में आह्लाद कर
उसे हिरन की तरह
चौकड़ियाँ भरने को प्रेरित कर रही है लगातार।

क्या मैं लम्बे समय तक खेती रह सकूँगी यह नाव ?
क्या मैं अकेले ही देखती रहूँगी
प्रकृति का यह अनुपम उपहार
यह दृश्य
जिसमें समाहित हुआ है दिव्यता का दिव्य भाव ?

अब जबकि बिन माँझी की मेरी नौका
सौन्दर्य से भरे तट तक पहुँचने से है बस थोड़ी ही दूर
देखती हूँ कि नाविक तो बैठा है बिल्कुल पास
अपनी थपकियों से मेरी व्याकुलता का शमन करता
धीरे - धीरे पतवार चलाता
जैसे रची जा रही हो कोई शोभाकृति चुपचाप.
मेरे ह्रूदयस्थल में अंकुरित होने लग गई हैं
कोमल भावनायें अकस्मात
और पंखों को फैलाकर गंतव्य की ओर भरने लगी हैं उड़ान
मैं स्वयं को समर्पित कर देती हूँ
जैसे कि कोई सजल सरिता
समुद्र की विशालता में हो जाती है विलीन।

प्रेम की वाणी से पूरित चुप्पी और एकान्त ने
प्रार्थनाओं से भर दिया हैं मेरे अंतर्मन को
इस उदात्त ऊष:काल में बह जाने दो मुझे
हो जाने दो मग्न मुग्ध मुदित बेपरवाह।

कोई विघ्न न डाले
वरदान से आप्लावित इस मन:लोक में
कोई नष्ट न कर दे
इस स्वर्गिक संसार को
प्रेम के शाश्वत प्रतीक
कृष्ण की तरह और राधा की तरह
अनश्वरता से सहेज लेने दो इस अद्भुत जलयात्रा को
जो मुझे बनाए जा रही है
तुम्हारा एक सच्चा साथी और एक प्रसन्नचित्त दोस्त।

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Wednesday, November 18, 2009

प्रश्न और पागलपन


आज एक बार फिर निज़ार क़ब्बानी की दो प्रेम कवितायें !

प्रश्न

मेरे महबूब ने पूछा :
'क्या अन्तर है
मुझमें और आसमान में ?'

अन्तर , मेरे प्यार,
बस इतना ही :
कि जब हँसते हो तुम
तो मैं भूल जाता हूँ आसमान ।

पागलपन

ओह, मेरे प्यार
अगर तुम पहुँच जाओगे
पागलपन के मेरे मुकाम तक
तो गला दोगे अपने सारे आभूषण
बेच आओगे अपने कंगन
और मेरी आँखों में
सो जाओगे
सुख की नींद ।
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( निज़ार क़ब्बानी की कुछ कवितायें और परिचय यहाँ और यहाँ और यहाँ भी )

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Sunday, November 15, 2009

अंतरंग संबंधों पर लेखन : अवधारणा और बाजार

आत्मकथा के आयाम में बहुत चितेरे होते हैं, जो पाठकों को आकर्षित करते हैं, किंतु उससे कहीं अधिक आकर्षित करते हैं समाज और निजी जिंदगी के प्रवाह में डूबते-उतराते रिश्ते। संबंधों की अंतरंगता हर किसी के जीवन के खास पहलू होते हैं। उन संबंधों की याद में लोग भावुक होते हैं, जिंदगी से तृष्णा व वितृष्णा होती है और फिर किसी हवा के झोंके के साथ उससे गाहे-बगाहे सामना भी करना पड़ता है।
पाश्चात्य संस्कृति में पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद या हकीकत जो भी हो लेकिन भारतीय परिवेश में इसके मायने अहम हैं। साहित्य, फिल्म के अलावा राजनीति की चमचमाती जिंदगी में संबंधों की अपनी अहमियत है और अंतरंग प्रसंगों को चटखारे लेने की परंपरा भी नई नहीं है। यही कारण है कि पत्रकार नंदिता पुरी द्वारा लिखी गई किताब ‘अनलाइकली हीरो : द स्टोरी ऑफ ओमपुरी’ लोकार्पण होने के पहले ही सुर्खियां बटोर रही है और ओमपुरी के बयान के कारण विवादों की चपेट में है। किसी की जिंदगी के महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सों को सस्ते और चटखारे वाली गॉसिप में बदलना किसी विश्वासघात से कम नहीं है।

अब्दुल बिस्मिल्लाह, वरिष्ठ साहित्यकार : कई महिलाओं ने अंतरंग प्रसंगों पर लिखा है। चाहे अपने जीवन में आए पुरूषों से संबंधों को लेकर हो या पति को लेकर। माना जा रहा है कि यह काफी साहस का काम है, खासकर पति के क्रियाकलापों पर। अभी तक घर की महिलाएं उनके कारनामों पर टिप्पणी करने का साहस भी नहीं कर पाती थीं। भयभीत रहती थीं, लज्जा के साथ-साथ संकोच भी करती थीं। जब पढ़-लिखकर उनमें चेतना आईं तो वह बात कहने लगीं जिसे कहने में उन्हें संकोच होता था। साहस आया तो वह खुलकर कहने लगीं। वर्तमान दौर में बाजार इस कदर हावी है कि चीजों को माल बनाकर बेचना एकमात्र लक्ष्य हो गया है। इसमें मीडिया भी व्यापक तौर पर काम कर रहा है। ऐसी किताबें छपती हैं जो बाजार लुभाता है। हालांकि यह पूरी स्त्री जाति की कहानी नहीं है। स्त्रियों का एक वर्ग है जो यह काम कर रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्त्रियों पर व्यापक अत्याचार हुआ है। लेकिन ऐसे अनुभवों को शब्दों में पिरोने का काम गांव की स्त्रियां नहीं, महानगरों में रहने वाली स्त्रियां कर रही हैं। संस्कृत में ए क श्लोक है, ‘सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियं’। हमारी संस्कृति में यह बात रही है। इसलिए किसी के बारे में कुछ बोलने या लिखने के पहले इसका ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए । इसमें संदेह नहीं कि आत्मकथा या कहानी के जरिए अपनी या अपने पति की जिंदगी के अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाना एक साहस का काम है। इसे नकारात्मक ढंग से न लेकर सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए । ए क स्त्री ने जो झेला है, भोगा है, वह लिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इसका साहित्यिक स्तर क्या है। आ॓मपुरी के मामले में बाजार एक बड़ा फैक्टर है। स्त्रियों द्वारा अंतरंग प्रसंगों को लिखा जाने का मामला इतना सरल नहीं है जितना समझा जा रहा है। यह आत्मकथा है तो साहित्यिक स्तर देखा जाना चाहिए ।

पति-पत्नी या किसी स्त्री के द्वारा किसी पुरूष या अपने पति के किसी स्त्री के साथ अंतरंग संबंधों को शब्दों को पिरोकर पन्नों में समेटने के मामले में जेहन में पहला नाम कमला दास का आता है। इन्होंने अपने दौर में ‘माई स्टोरी’ लिखकर न सिर्फ अंग्रेजी में बल्कि साहित्य जगत में एक बहस की शुरूआत की थी। इसके बाद अमृता प्रीतम में ‘रसीदी टिकट’ लिखा। कालांतर में अपने संबंधों और पब्लिक स्पेस के साथ-साथ जिंदगी की राहों पर मुश्किलों से रूबरू होने की कहानी तसलीमा नसरीन ने ‘द्विखंडिता’ के जरिए पेश किया। ऐसे ही समय में मन्नू भंडारी ने ‘एक कहानी यह भी’, प्रभा खेतान ने ‘अन्या से अनन्या तक’, मैत्रेयी पुष्पा ने ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ से स्त्रीवादिता के नए आयाम को जन्म दिया।
अनामिका, कवियित्री : कुछ घाव छोटे होते हैं और जब पछुवा चलती है तो गुमचोट या
गुमजोड़ों का दर्द उभरकर सामने आ जाता है। पश्चिम का प्रभाव बुरा नहीं होता क्योंकि
गांधीजी से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था खिड़कियां खुली रखी जानी चाहिए । इससे
प्रभावित लेखनी भी बुरी नहीं है। सामान्य तौर पर जब लड़कियां ससुराल जाती हैं तो कहा
जाता है कि दोनों घरों के सुख-दुख तुम्हें देखने हैं, मुंह सील कर रखना। पिटाई खाकर भी वह सब कुछ सहती है, खुद को भूल जाती है, कई दिक्कतों के साथ घर-गृहस्थी चलाते-चलाते वह खुद को हाशिये पर ला खड़ा करती हैं। स्त्री-पुरूष संबंधों में दो तकलीफें हैं, पहला कामना का सरप्लस मतलब यौनानुराग। हर स्त्री चाहती है कि उसका पुरूष जितेंद्रिय हो, लेकिन घर-गृहस्थी में फंसे होने के कारण स्त्री खुद पर ध्यान नहीं देती और पुरूष दूसरों के आकर्षण में रीझ जाता है। दूसरा है गुस्सा, बाहर का गुस्सा घर में उतारा जाता है। पुरूषों को बाहर में काफी कुछ झेलना होता है, इस कारण घर में स्त्री साफ्ट टारगेट बनती है। स्त्री-पुरूष की लड़ाई न तो दो वर्गों की लड़ाई है और न ही दो जातियों के बीच। यह गोरे-काले की भी लड़ाई नहीं है और न ही यहां सत्ता परिवर्तन का व्याकरण ही लागू होता है। स्त्री आंदोलन प्रतिशोध का आंदोलन नहीं है। परिवार में पीढ़ियों के बीच जेंडर का मुद्दा संवाद के जरिए सुलझाया जा सकता है। यहां भेड़-भेड़िये का रिश्ता नहीं है। तसलीमा नसरीन से लेकर मैत्रेयी पुष्पा ने वही लिखा है जो उसने पब्लिक स्फेयर में महसूस किया। जब वे किसी संपादक से मिलती है, गॉड फादर से मिलती है या किसी और से। प्रेम तो सबसे बड़ा लोकतांत्रिक स्पेयर है। यदि आप किसी स्त्री से पूछें तो वह यही कहेगी तो उसका शरीर तो ए कमात्र ढोल है जिसे वह जबर्दस्ती ढोने के लिए मजबूर हैं। यही कारण है कि पब्लिक स्पेयर में जाने से वह घबराती है कि पता नहीं क्यों होगा। जो स्त्रियां ऐसे लिख रही हैं उनका संवाद आने वाली पीढ़ियों से है, किशोरों से है, युवाओं से है। अंतरंग संबंधों को लेकर उनको शर्मिंदा करना ए क भाव होगा लेकिन इसके जरिए संदेश देने का काम कर रही हैं।
सामान्यतौर से लोग नकारात्मक उदाहरणों से सीखते हैं। यह इसलिए लिखा जा रहा है कि
आने वाली पीढ़ी अपनी मां, बहनों की तकलीफों को समझे। इसलिए संदर्भ सहित बातें रखी
जाती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने लोग ऐसा करने से एक बार सोचें। यह लेखन आत्मनिरीक्षण का एक अवसर देता है।

क्या वास्तव में पति-पत्नी संबंध या जीवन के किसी मोड़ पर पर स्त्री या पर पुरूष से मुलाकात व संबंधों की यह विवेचना गंभीर साहित्य पर सवाल खड़ा नहीं करती? क्या समाज की नैतिकता इस कदर विलुप्त हो चुकी है कि साहित्यकारों व पत्रकारों को निजी जिंदगी के तमाम पहलुओं में बाजार दिखता है जिसे सार्वजनिक किए जाने के बाद ‘नेम’ व ‘फेम’ दोनों उनके कदम चूमती है? जो साहित्य कभी अच्छे मूल्य से समाज को रूबरू कराता था क्या उस समाज में मूल्य खत्म हो गए हैं, यह वह समाज ही नहीं है जो मूल्यों को जान सके? क्या पूंजीवाद इतना हावी हो गया है कि हर चीज बतौर माल बाजार में पेश आने लगी हैं? आरोप है कि नोबल पुरस्कार विजेता बी.एस. नायपाल ने अपनी पत्नी से जानबूझकर उनके वेश्यालयों में जाने की कहानी पाठकों के सामने लाने का काम किया था।
चाहे नेहरू-एडविना को लेकर किताब लिखे जाने का मामला हो, या बेनजीर-इमरान की जिंदगी को लेकर लिखे अंतरंग संबंध के किस्से, इनके सनसनीखेज खुलासे से चर्चा में आना लाजिमी है। चाहे प्रकाशक हो या लेखक, सालों मेहनत के बाद किताब को प्रकाशित करता है तो इस पूंजीवादी युग में वह इसका आर्थिक लाभ की चाहत भी रखता है। यही कारण है कि वर्ल्ड बुक फेयर से कुछेक समय पहले पत्रकार नंदिता पुरी ने इस किताब को पाठकों के सामने रख बाजार को देखते हुए विवाद जानबूझकर विवाद पैदा करने का काम किया है।
यही कारण है कि वर्तमान दौर में लेखन एक ऐसा व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है जहां जीवन के मूल्य, अंतरंग संबंध गौण हो गए हैं। यही कारण है कि ‘सच का सामना’ में जिन अंतरंग संबंधों को लेकर सवाल किए जा रहे थे और जवाब देकर पैसे कमाए जा रहे थे, वहां नैतिकता, सामाजिकता और मर्यादा कोई मायने नहीं रखती थी बस मायने था तो पब्लिसिटी और पैसा। अंतरंग संबंधों का खुलासे करने के मामले में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि महानगरों में रहने वाली मुट्ठी भर स्त्रियां अपनी अभिशप्त जिंदगी को लोगों के सामने रखने का साहस कर रहीं हैं। वह भी तब जब पुरूषप्रधान समाज अपनी नंगई करने से बाज नहीं आता। पर्दे के पीछे और घर में हाड़तोड़ काम करने के बाद उसके शब्द लोगों को चटखारे लेकर पढ़ने के लिए आकर्षित करें, यह सामान्य बात नहीं है।

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Saturday, November 14, 2009

ये हिमालयी कचरागाहें







अभी हाल ही में मोटर साइकिल भ्रमण करते हुए यमुनोत्री जाना हुआ था । कई अच्छे और ख़राब अनुभव रहे . अच्छे -अच्छे लिख चुका बैठ के मयखाने में और ख़राब ले के आ पसरा हूँ कबाड़ खाने में , इस उम्मीद में की कुछ सहानुभूति ही मिल-मिला जाए यार लोगों की ! फ़िर एक वरिष्ठ ब्लॉग-धर्मी भी इन दिनों बहुत कुछ लिख रहे हैं गंगा-घाट की सफाई और पिलाट्टिक के प्रबंधन के बारे में । उन्हें भी कहना चाहता हूँ के गंगा हो या जमना सब ऊपर से बहती हैं महाराज और ऊपर से ही पिलाट्टिक मय कर दी जाती हैं सो ये साफ़-सफाई अधूरी है । बहरहाल पैदल यात्रा मार्ग में प्लास्टिक के ऐसे-ऐसे कब्रगाह नज़र आए कि साँस अटकने को हो गयीं । अब पहले के मुकाबले चढाई का रास्ता पक्का ज़रूर कर दिया गया है और जगह-जगह डस्टबिन भी टांग दिए गए हैं मगर बावजूद इसके जो दिखा वो आप भी देख लें --
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अगर आप धार्मिक हैं तो जान लीजिये कि शनि और यमराज की बहिन यमुना को गंदा करने का हश्र क्या होगा और अगर नास्तिक हैं तो भी आपको समझाना क्या , पर्यावरण की रक्षा का महत्व सभी के लिए है भाई और आइये मिल कर तै करें कि इस तरह नदियों को गंदा करने वालों का क्या इलाज होना चाहिए ।

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