Wednesday, November 11, 2009

नैनीताल फिल्म फेस्टिवल के बहाने

लंबे अरसे से सोचता था कि नैनीताल में कोई फिल्म फेस्टिवल किया जाए. दोस्तों के साथ मिलकर योजना बनाने की कोशिश भी की. लेकिन कभी कुछ तय नहीं हो पाया. इस बार पता चला कि अपने ही कुछ पुराने साथी वहां पर फिल्म फेस्टिवल की तैयारी कर रहे हैं तो मैं भी साथ में जुट गया. फेस्टिवल क़रीब आने पर दोस्तों से मिलने की ख़्वाहिश लिए मैं दिल्ली से नैनीताल के लिए निकल पड़ा. हमें उत्तराखंड संपर्क क्रांति से हल्द्वानी तक जाना था. साथ में भारत भी था. शाम चार बजे की ट्रेन थी लेकिन हम तीन बजे ही स्टेशन पहुंच गए. ऐसा बहुत कम हुआ है कि संपर्क क्रांति वक़्त पर चले. यही सोचकर पिछले महीने जब हल्द्वानी जाने के लिए स्टेशन पहुंचा तो ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी. तबीयत कुछ ख़राब थी. ऐसे में शारीरिक थकान तो थी ही मानसिक तौर पर भी बड़ी मुश्किल हुई. उस दिन टिकट कैंसल कर दूसरे दिन ट्रेन पकड़ी थी. इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि निर्धारित वक़्त से पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएंगे. नतीज़ा ये हुआ कि पूरे एक घंटे प्लेटफ़ार्म पर इंतज़ार करना पड़ा.
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर छह से काठगोदाम के लिए ट्रेन चली तो रिजर्व्ड डिब्बों में भी लोग ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे. कुछ सोते, कुछ जागते और कुछ पढ़ते रात के ग्यारह बजे हल्द्वानी पहुंचे. ट्रेन एक घंटा लेट थी. किसी रिश्तेदार के घर जाने की बजाय पुराने दोस्त और पत्रकार जहांगीर के पास जाना मुझे ज़्यादा ठीक लगा. वहां पहुंचा तो वो अतीत की बातें करता रहा. कुछ दोस्तों के फोन नंबर उसके पास थे. उनसे बात करवाता रहा. इस बीच भरी जवानी में साथ छोड़ चुके दोस्तों को भी हम याद करते रहे. कभी जो गहरे दोस्त थे और अब अजनबी बन चुके हैं ऐसे रिश्तों की बातें भी बीच में आईं. हम सोचते रहे कि छोटे से वक़्त में कितना कुछ बदल गया है.
सुबह जहांगीर अपनी गाड़ी से टैक्सी स्टैंड तक छोड़कर गया. शेयर्ड टैक्सी जैसे ही काठगोदाम से ऊपर की ओर चली अगली सीट पर बैठा मैं बाक़ी सवारियों से बेख़बर पहाड़ों को गौर से देख रहा था. हवा, पानी, पेड़, पत्थर, ज़मीन सब जाने-पहचाने लग रहे थे. मैं पुराने दिनों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था. अचानक लगा कि दिल्ली में रहते मैं इस मिट्टी की गंध से कितना दूर हो गया हूं. नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह मुझ जैसे लोगों को स्वर्ग से ठुकराए हुए लोग यूं ही नहीं कहते. ख़ैर, आधे रास्ते में पता चला कि पिछली सीट में विवेक दा भी बैठे हैं. वो कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता हैं. पिछले कई सालों से दिल्ली में थे अब उत्तराखंड में पार्टी का काम देखते हैं. उन्होंने ही पहचानते हुए पीछे से मेरा नाम पुकारा. मिलकर अच्छा लगा. फिर रास्ते में वो उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों की लूट की कहानी बताते रहे. ज़ोर देते रहे कि मैं इस बारे में ज़रूर कुछ लिखूं. उन्होंने ये भी बताया कि कैसे पूरे राज्य में माओवाद का हौव्वा खड़ा कर आंदोलनकारियों पर लगाम कसी जा रही है. पिछले साल पीयूसीएल और पीयूडीआर की तरफ़ से उत्तराखंड आयी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी में मैं भी शामिल था. इसलिए मुझे उनकी इस बात की गंभीरता पता थी. हम लोग प्रभाष जोशी की मौत और आज की बाज़ारू पत्रकारिता पर भी बात करते रहे.
नैनीताल मुझे हमेशा से लुभाता रहा है. लेकिन इस बार जब वहां पहुंचा तो लगा कि शहर का रंग उड़ा हुआ है. ये बात मैंने विवेक दा से पूछी. उन्होंने याद दिलाया कि पतझड़ का महीना है. लेकिन मैं सोचता रहा कि आसपास सदाबहार जंगल होने के बाद भी शहर में पतझड़ का इतना असर क्यों है. शायद बाहर से लाकर ज़बरदस्ती यहां लगाए गए पेड़ों की वजह से ऐसा था. पूरे माहौल में मुझे एक नकलीपन जैसा लगा. हम तल्लीताल से रिक्शे पर मल्लीताल के लिए निकले. मुझे अतीत में यहां बिताए दिन याद आते रहे. मॉल रोड से गुजरते हुए मैं हर आदमी और दृश्य को पहचानने की कोशिश कर रहा था. लेकिन सैलानी जोड़ों और दुकानों की चमक-दमक के बीच अपना जैसा कुछ भी नहीं लगा.
शैले हॉल में पहले नैनीताल फिल्म फेस्टिवल की गहमा-गहमी थी. शहर में घुसते ही जो वीराना और अजनबीपन लगा था. यहां आकर वो पूरी तरह दूर गया. एक साथ ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मिले. जिनसे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी ऐसे साथियों से मिलने का सुख बयान नहीं किया जा सकता. तब लगा नहीं कि वक़्त ने हम सबको एक-दूसरे से कितना दूर कर दिया है. स्कूली दिनों का साथी प्रकाश इतने सालों बाद अचानक मिल गया. उसने बताया कि आजकल वो कहीं एसडीएम है.
ज़िंदगी के अलग-अलग इलाक़ों से लोग यहां पहुंचे थे. कोई आंदोलनों में सक्रिय था तो कोई रंगमंच में, कोई साहित्य में तो कोई सिनेमा में. सब से कोई न कोई पुराना रिश्ता. वे पूरी आत्मीयता से अपने-अपने विषय की बात बताते रहे. आंदोलन वाले मुझसे आंदोलनकारी की तरह बोल रहे थे तो रंगमंच वाले रंगकर्मी की तरह. साहित्य वाले और सिनेमा वालों का भी यही अंदाज़ था. मुझे लगा कि हर रास्ते में चलने की कोशिश में मैं उलझकर रह गया. मुझसे अच्छे तो वो साथी है जिन्होंने गंभीरता से कोई काम किया.
वीरेनदा हमेशा की तरह हुलसकर गले मिले. तो त्रिनेत्र जोशी ने भी सदाबहार मुस्कान के साथ स्वागत किया. इलाहाबाद से प्रणय कृष्ण, कानपुर से पंकज चतुर्वेदी और दिल्ली से अजय भारद्वाज चंद्रशेखर पर बनाई फिल्म एक मिनट का मौन के साथ पहुंचे थे. ज़हूर दा में आज भी वही पुरानी सक्रियता दिख रही थी. शेखर पाठक दोनों दिन डटे रहे. उन्होंने बताया कि वो इन दिनों हिमालयी इलाक़ों में औपनिवेशिक घुसपैठ के ऐतिहासिक अध्ययन को पूरा करने में जुटे हैं. इसके लिए उन्होंने फिर से पूरे हिमालयी इलाक़ों की खाक छान मारी है. बटरोही और गिर्दा भी प्यार से मिले. राजा बहुगुणा, गिरिजा पाठक, कैलाश, केके से मिलकर भी अच्छा लगा. त्रिभुवन फर्त्याल और अनिल रजबार भी बीच-बीच में चेहरा दिखाते रहे. गिरिजा पांडे, प्रदीप पांडे और हरीश पंत भी आते-जाते रहे. गढ़वाल से आए मदन मोहन चमोली अपने फकीरी ठाठ में दिखे. और भी ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मौजूद थे. पिछले अस्कोट-आराकोट अभियान के अमेरिकी साथी डेन डेंटजन और फ्रांस की पेंटर और फिल्ममेकर कैथरीन से भी मिलकर अच्छा लगा. फेस्टिवल की रीढ़ और फिल्म मेकर संजय जोशी हर वक़्त सही स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने में जुटे नज़र आए.
दोनों दिन पूरी गहमा-गहमी रही. फेस्टिवल की ज़्यादातर फिल्में पहले से देखी हुई थीं. इसलिए मैं कभी फिल्म देखता रहा तो कभी हॉल के बाहर दोस्तों से बात करता रहा. वहां चार्ली चैप्लिन की मॉडर्न टाइम्स, वित्तोरियो दे सिका की बाइसिकल थीव्स, माजिद मजीदी की चिल्ड्रन ऑफ़ हैवन और एमएस सथ्यू की गर्म हवा जैसी फिल्में दिखाई गईं. इनके अलावा नेत्र सिंह रावत की माघ मेला और एनएस थापा की एवरेस्ट भी दिखाई गई. प्रतिरोध के सिनेमा का ये पहला फेस्टिवल भी इन्हीं को समर्पित था. इनके अलावा और भी कई डॉक्यूमेंटरीज वहां दिखाई गईं. हैरत की बात ये थी कि फेस्टिवल के दौरान वहां लगातार ख़ुफिया विभाग वाले अड्डा ज़माए रहे. पता चला कि पहले दिन दैनिक जागरण ने छापा था कि फेस्टिवल की आड़ में नैनीताल में नक्सली जुटने जा रहे हैं. इसलिए इंटैलीजेंस वालों के वीडियो कैमरों की नज़र हम पर लगातार लगी रही.
फेस्टिवल फिल्मों के अलावा भी बहुत कुछ था. वहां अवस्थी मास्साब के बनाए पोस्टरों के डॉक्यूमेंटेशन को देखना एक अद्बुत अनुभव था. मास्साब अब दुनिया में नहीं है. वो अपने हाथों से जनआंदोलनों के पक्ष में और सामाजिक विरूपताओं पर चोट करने वाले पोस्टर बनाते थे और उन्हें गले में आगे-पीछे लटका कर शहर में घूमते थे. नैनीताल के लोग इस अद्भुत व्यक्तित्व को कभी भुला नहीं पाएंगे. जब नैनीताल में था तो ज़हूर दा के इंतख़ाब में उनसे अक्सर मुलाक़ात होती थी. विनीता यशस्वी ने उनके पोस्टरों को सहेज कर बहुत बड़ा काम किया है. इस मौक़े पर बीरेन डंगवाल के कविता संग्रह स्याही ताल और दिवाकर भट्ट के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आधारशिला के त्रिलोचन विशेषांक का भी विमोचन हुआ.
फेस्टिवल का सबसे यादगार और महत्वपूर्ण अनुभव रहा भारतीय चित्रकला पर अशोक भौमिक का प्रभावशाली व्याख्यान. सालों से सोचता रहा हूं कि जिसकी पेंटिंग्स जितनी महंगी बिकती हैं वो उतना बड़ा कलाकार कैसे मान लिया जाता है. अशोक दा की बातों में मुझे इस सवाल का जवाब मिल गया. उन्होंने रज़ा, सूजा और हुसैन के मुक़ाबले चित्त प्रसाद, जैनुअल आबीदीन और सोमनाथ होड़ की जनपक्षधर कला से रू-ब-रू कराया. थैंक्यू अशोक दा! फिल्म फेस्टिवल के दौरान ही शहर में सरकारी शरदोत्सव भी चल रहा था. वहां दिखाए जा रहे बाज़ारू कार्यक्रमों की वजह से ज़्यादातर साथी नाराज़ दिखे.
नैनीताल में शाम होते-होते पड़ने वाली हाड़ कंपा देने वाली ठंड का भी अपना ही एडवेंचर था. कुंडल ने ठंड भगाने की कुछ व्यवस्था तो की लेकिन सबकी ठंड दूर कर पाना इतना आसान नहीं था. इसलिए शायद बाहर से आए कुछ साथी निराश भी हुए. रात हमने अभिनेता इदरीश मलिक के होटल में बिताई. आजकल वो पारिवारिक वजहों से शहर में ही रहते हैं. फेस्टिवल के दौरान उनसे मुलाक़ात हो चुकी थी. हां, टीवी कलाकार हेमंत पांडे से भी मिला था. मैंने हैलो किया तो भाई की नज़र हवा में टिक गई. मैं समझ नहीं पाया कि मुझे सचमुछ नहीं पहचाना गया या बात कुछ और थी.
इतनी जल्दी शहर छोड़ने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन जल्दी लौटने की मज़बूरी थी. सुबह साढ़े पांच बजे जागकर हमने होटल छोड़ दिया. सुबह मैं और भारत वॉक करते हुए मल्लीताल से तल्लीताल पहुंचे. नैना देवी के मंदिर में घंटियां बज रही थीं, मैंने घंटियों की आवाज़ की तरफ़ ध्यान दिलाया तो उसने जोड़ा कि इससे पहले कीर्तन और अजान भी सुनाई दे रहे थे. न जाने क्यों नास्तिक होने के बाद भी मुझे कीर्तन और अजान में एक अद्भुत क़िस्म के संगीत का अहसास होता है. वो मेरे लिए म्यूजिक विद्आउट लिरिक जैसा कुछ है. पौ फट चुकी थी. धीरे-धीरे अंधेरा छंट रहा था. तल्लीताल कोर्ट के आसपास के भवन चांदी की तरह चमक रहे थे. ठंडी सड़क की तरफ़ अब भी अंधेरा था. झील में रोशनियों के प्रतिबिम्ब धीरे-धीरे तैरते हुए ख़त्म हो रहे थे. अंग्रेजों के बनाए गोथिक स्टाइल के आर्किटेक्चर में नैनीताल बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था.
वो नौ नवंबर का दिन था. यानी उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस. तल्लीताल पहुंचने पर देखा कि उमा भट्ट की अगुवाई में महिला मंच की कार्यकर्ता बसों में भरकर गैरसैंण जा रही थीं. राज्य बनने के नौ साल बीत जाने के बाद भी लोग पहाड़ में राजधानी पाने के लिए लड़ रहे थे. सत्ताधारियों को जनता की ये मांग बेवकूफी लगती है. पहाड़ मुझे वहीं नज़र आया. जहां मैंने सालों पहले छोड़ा था. आंदोलन अब भी जारी हैं और प्रतिरोध की कलाएं उनके साथ खड़ी हैं. नैनीताल के लौटते वक़्त बस की अगली सीट पर बैठे मैंने देखा कि कहीं दूर नेपाल की पहाड़ियों में उग रहे लाल सूरज की किरणें यात्रियों की आंखों को चुंधिया रही थीं. हर मोड पर ये रोशनी और ज़्यादा तेज़ महसूस हो रही थी. ताज्जुब की बात ये कि मैंने आज तक पहाड़ी सफ़र में कभी इस तरह का सूरज नहीं देखा था. बस पटवाडांगर, ज्योलीकोट होते हुए आगे बढ़ रही थी. पतझड़ पीछे छूट चुका था. चारों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे. भावर की ढलान के बाद आगे मैदान शुरू होने थे. फिर एक दूसरे भूगोल में आना था.

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Tuesday, November 10, 2009

ऊपरी असम की ओर

वह भी कोई देश है महाराज, भाग-15
जीएल अग्रवाला भूल जाएं, इससे पहले यानि फौरन से पेश्तर उनके प्रस्ताव पर अमल कर डालना था। जनता होटल से डेरा-डंडा उठाया गया और अगली रात हम लोग जोरहाट जाने वाली बस में बैठ गये। निचले के बाद अब ऊपरी असम का चक्कर लगाने का इरादा था। विभोर भाव से ब्रह्मपुत्र में धुंध से घिरे लाइट हाउसों को देखते और स्टीमरों की सीटियां सुनते हुए भोर में पांच बजे हम लोगों ने पूर्वांचल प्रहरी के जोरहाट दफ्तर की ऊपरी मंजिल पर बने गेस्ट हाउस में जीएल अग्रवाला के खास कमरे में डेरा डाल दिया। वहां आलमारियों में अगरबत्तियां, मोमबत्तियां, तरह-तरह के स्प्रे, असमिया और अंग्रेजी में कचहरी की न समझ में आने वाली फाइलें और बदलने के लिए कपड़े इफरात थे। अपने काम की चीजों का हम लोगों ने तुरंत इस्तेमाल भी शुरू कर दिया। लेकिन सारी सजधज बेकार थी। उस दिन कहीं जा नहीं सकते थे क्योंकि आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने हिंदी भाषियों की हत्याओं के विरोध में बंद का आह्वान किया था। पूर्वोत्तर का बंद वाकई बंद होता है। सचमुच उस दिन पत्ता नहीं हिलता।
नीचे अखबार का दफ्तर था, उपर गेस्ट हाउस। पाजामा पहने बस नीचे जाकर बैठ जाना होता था कि सारी लोकल खबरें अपने आप मिलने लगती थीं। एक रिपोर्टर कालिता खबर लाया कि बंद के कारण दिल्ली से आये हुए एक बुजुर्ग पत्रकार यहां के एक होटल में फंसे हुए हैं। हम लोगों ने सोचा कि जरा दिल्ली वाले को चल कर देखा जाए कि वह यहां जोरहाट में क्या तलाश रहा है।

ये सज्जन दिल्ली वाले नहीं मेरे नए बने दोस्त पत्रकार हरिश्चंद्र चंदोला थे जो दिन के पांच बजे अपने लैपटाप की स्क्रीन घूरते हुए, थाली में भात के साथ आमलेट सानने का प्रयास कर रहे थे। सारे बाजार, दुकानें बंद होने के कारण उन्हें यह बेमेल खाना अब मिला था। कोई छह महीने पहले बरेली में पहली बार उनका जिक्र मेरे कवि चचा वीरेन डंगवाल ने करते हुए बताया था कि कई देशों में रिपोर्टिंग करने, खासतौर से खाड़ी देशों में युद्ध कवर करने के बाद, वे इन दिनों जोशीमठ (उत्तरांचल) में आलू की खेती कर रहे हैं। भालुओं से आलुओं की रखवाली के लिए उन्हें रातों को जागना पड़ता है। चचा के बताने का ढंग कुछ ऐसा था कि उनसे मिलने जोशीमठ जा पहुंचा। पता चला देहरादून चले गये हैं। देहरादून में उस दिन उत्तराखंड राज्य की पहली सरकार शपथ लेने वाली थी। जब उनसे मुलाकात हुई तब पता चला कि उत्तर-पूर्व में उनके जीवन का खासा बड़ा हिस्सा गुजरा है। साठ के दशक में वे टाइम्स ऑफ इंडिया के कोहिमा संवाददाता थे और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने उन्हें नगा उग्रवादियों और सरकार के बीच मध्यस्थ बनाया था। वहीं उन्होंने एक नागा लड़की से शादी की थी। दिलचस्प राजनीतिक परिस्थितियों में उन्हें एक खोनोंमा खेल (गांव) के एक नगा मुखिया ने गोद भी ले लिया था।

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Monday, November 9, 2009

बच्चा प्रसाद सुनार के गहने

वह भी कोई देश है महाराज, भाग-14
मैंने हैरत से उसकी ओर देखा। हर तरफ खून, लाशों और आशंकाओं की गंध से भरी हवा में एक इतने दिन घूम लेने के बाद अब जाकर मुझे पहली बार डर लगा। एक क्षण के लिए लगा सांस को भीतर ले जाने के लिए कोशिश करनी पड़ रही है। पचीस दिनों का होटल का किराया और खाने का बिल बाकी था। दो पीसीओ वालों के धुंआधार फोन और फैक्स का उधार था। हम लोगों की जेब में कुल जोड़कर पचीस-तीस रुपये बचे थे। शाश्वत के क्रेडिट कार्ड की सीमा से ज्यादा पैसा हम लोग निकाल चुके थे। उसके बड़े भाई को इलाहाबाद से पंद्रह दिन पहले ही पैसा उसके बैंक खाते से निकाल कर भेज देना चाहिए था। किसी तकनीकी या कागजी दिक्कत के कारण ऐसा नहीं हो पाया था। मेरा चिल्ला पड़ने का मन हुआ कि उसने पहले क्यों नहीं बताया। सारी खिचड़ी अकेले पका रहे थे, ससुर अब बता रहे हैं जब इतने पैसे भी नहीं बचे हैं कि यहां से हिल भी सकें। मैंने लपक कर से कहा, "तो क्या हुआ, तुम अपने फूफा, हिज हाइनेस गवर्नर से मांग लो, अभी मिलने का जुगाड़ बैठा कि नहीं?"

अपनी गोपनीय योजना के बारे में मेरी जानकारी पर चकित हुए बिना लाचारी में कई बार "हद हो गयी.... हद हो गयी" बुदबुदाने के बाद उसने बेहद शरीफ आदमी की तरह कहा, कमाल चूतिया हो। इतने दिन बाद किसी रिश्तेदार से मिलेंगे तो तुरंत पैसा मांगने लगेंगे? क्या समझेंगे वो, कि साले दरिद्र अब जगह-जगह मांग कर गुजारा कर रहे हैं।’
इसके बाद उस दिन हम लोगों ने आपस में बात नहीं की, आशंकाओं में अकेले-अकेले डूबते-उतराते रहे।

रात में होटल लौटने पर पहली बार धीमी लाल रोशनी वाले गलियारों में आते-जाते बेयरों की तेरफ मेरा ध्यान गया। उन सभी की बाहों में मछलियां उभरी हुई थीं। पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में जाने के लिए गौहाटी में चार-छह घंटे रुककर बस का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे यात्रियों के कारण ही यह सबसे पुराना सबसे सस्ता जनता होटल एक सौ तीस साल से गुलजार था। एक ही कमरा चैबीस घंटे में तीन-चार बार किराये पर दिया जाता था। रात में जिन कमरों में महिलाएं होती थीं, बेयरे उनके रोशनदानों पर चमगादड़ों की तरह लटकते रहते थे। हर आधे घंटे बाद गैलरी में किसी संगठित टीम के खिलाड़ियों की तरह सिर जोड़कर, वे कमरों के बुलेटिन एक दूसरे को सुनाते थे और कमरे बदल लेते थे। भोर तक चलने वाले इस कठिन एवं सम्मोहक व्यायाम के कारण उनकी बाहें पुष्ट और शक्तिशाली हो गयी थीं। शाश्वत को हताशा का निम्न रक्त चाप का हल्का दौरा पड़ा, वह बिस्तर पर पड़ा बारी-बारी से अपनी हथेलियां निहारने लगा। अनुभव से मैं जानता था कि यह दौरे का प्रमुख लक्षण था। मैंने अपने और उसके बैग और सारे कपड़ों की जेबों को छानने के बाद उसके पास पड़े तेरह रुपये मांगे। उन आखिरी पैसों से मैं रम का एक पौवा खरीद कर लाया और इत्मीनान से बैठकर आचमन करने लगा। इसी दौरान तय किया गया कि कल शाश्वत की दोनों अंगूठियां और जरूरत पड़ी तो उसकी अटैची में पड़े उसकी मां के अटेहरू सर्राफा बाजार में गिरवी रखकर पैसों का इंतजाम किया जाएगा। अटेहरू एक कश्मीरी गहना होता है जिसे वहां की औरतें झुमके की तरह पहनती हैं। इस गहने को पहले भी एक बार लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्य रामनारायन साहू की दुकान पर हम लोग गिरवी रख चुके थे।

सर्राफा में अजनबी होने के कारण कोई उन्हें गिरवी रखने को तैयार ही नहीं था। जो तैयार भी हुए, वे हजार- पांच सौ से ज्यादा नहीं दे रहे थे। दरअसल हमें संदिग्ध समझकर कुछ खेल रहे थे, कुछ टरका रहे थे। दोपहर बाद हम उन्हें बेचने के लिए मोलभाव करने लगे। जिन दो-एक सुनारों ने खरीदने में दिलचस्पी दिखाई, वे ढाई-तीन हजार ही दाम लगा रहे थे जबकि सिर्फ अंगूठियां ही कम से कम, पन्द्रह हजार की थीं। ख्याल आया कि क्यों न इन्हें होटल मालिक के पास ही गिरवी रख दिया जाये। साथ ही यह भी विचार किया गया कि अगर उसने भांप लिया कि हम लोगों की जेब एकदम खाली है तो वह अपना किराया और खाने का बिल काटकर हमें चलता कर देगा, फिर क्या होगा। उसके बाद गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं बचेगा। शाम को एक मारवाड़ी सुनार ने सलाह दी कि हम स्टेशन के पिछवाड़े जायें, जहां पूर्वोत्तर में सुअर बेचने वाले ठेकेदार रहते हैं। वे पुरबिया होने के नाते हमारी मदद कर देंगे। तपाक से वहां पहुंचे तो पाया कि झुंड के झुंड किकियाते सुअरों के बीच चौकियों पर ठेकेदारों की गद्दियां थीं जहां कुप्पियां जल रही थीं। वे सुअरों की गुर्राहट व जीवन के आखिरी क्षणों में की जा रही मंत्रणा के बीच मच्छरदानियों में सोने की तैयारी कर रहे थे। पूर्वोत्तर में सबसे अधिक सुअर पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार से जाते हैं। ये ठेकेदार नहीं, उनके नौकर थे जो सुअरों की रखवाली के लिए रात में वहां टिके हुए थे। उनसे बात की तो पता चला कि उन्हें दिहाड़ी और खुराकी मिलती है लिहाजा वे अंगूठी गिरवी रखने की हालत में नहीं थे। हम लोग वापस लौट आये।

अगले दिन पीसीओ में बैठने वाला एक लड़का हम लोगों को स्टेशन के पास बच्चा प्रसाद सोनार के पास ले गया। बच्चा प्रसाद ने भी लाचारी जता दी। वे एक छोटी सी कोठरी में बैठककर निम्न मध्यवर्ग की गरीब स्त्रियों के चांदी का काम करने वाले सुनार थे। जो पायल, बिछिया, झुमके बनाते, बेचते और हजार-दो हजार तक की रकम देकर गिरवी रखते थे। उन्होंने हम लोगों को चाय पिलाते हुए बताया कि वे कभी कविताएं लिखा करते थे और जमशेदपुर में जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से एक रहे हैं। फिर उन्होंने दिल्ली से छपने वाला "राष्ट्रीय सहारा" दिखाया जिसमें मेरी रपट छपी थी। ...तो मेरी पहली रपट पूर्वांचल प्रहरी या दिल्ली के किसी तथाकथित बौद्धिक दिखने वाले संपादक ने नहीं, एक पैराबैंकिंग कंपनी के अखबार ने छापी थी और वहीं से उठाकर असम के एक बड़े ठेकेदार के अखबार ने छाप दी। कई साझा परिचय वाले हिंदी लेखकों की लनतनरानियों पर वार्ता के बाद बच्चा प्रसाद ने अपनी तरफ से प्रस्ताव किया कि वे अंगूठी तो गिरवी नहीं रख सकते लेकिन हजार रुपये उधार दे सकते हैं और हमारी रपटें जहां भी छपेंगी, उन्हें वे काटकर रखते जाएंगे। जब हम लोग पूर्वोत्तर से वापस लौटने लगेंगे तो पैसे देकर अपना सामान यानि रपटों की "क्लिंपिंग" ले जाएंगे। विलक्षण सुनार थे बच्चा प्रसाद, जिनकी नजर में हमारा गहना वे अखबार में छपने वाली रपटें थीं।

मैं वहां से उठकर सीधे पूर्वांचल प्रहरी के दफ्तर गया और उसके मालिक जीएल अग्रवाल से भिड़ गया कि मेरी अनुमति लिए बगैर मेरी रपटें वे कैसे छाप रहे हैं? मैंने सोचा था कि उन्हें दबाव में लेकर कुछ रुपये एडवान्स में ले लूंगा और आगे भी छपने के लिए बात कर ली जाएगी। तामुल के पसीने से छलछलाते भीमकाय जीएल अग्रवाला ने बड़े इम्मीनान से कहा कि वे रपट के लिए किसी को पैसे नहीं देते, इसलिए मुझे भी नहीं देंगे। उनके अखबार में लिखने के एवज में मैं पूर्वोत्तर में उनके ब्यूरो कार्यालयों में रुक सकता हूं और संवाददाताओं का गाइड की तरह इस्तेमाल कर सकता हूं। यह नकद पैसे मिलने से भी बड़ी चीज थी जो अनायास मुझे मिल रही थी। मैं उन्हें तत्काल सहमति देकर निकल आया क्योंकि होटल वाले के बिल की समस्या जब भी ज्यों की त्यों थी। उधर शाश्वत निम्न रक्त चाप की समस्या से बाहर आकर दिल्ली में अपने एक सहपाठी पत्रकार को फोन किया। सहपाठी ने अरुणाचल के एक सांसद लाटा अंब्रे से कहा। सांसद ने गौहाटी के एक ट्रैवल एजेंट और अपने समर्थक को हमें दस हजार रुपये देने को कहा। तीन घंटे बाद एजेंट ने होटल आकर हम लोगों को पैसे दे दिये। न पहले न बाद में, सांसद लाटा अंब्रे से हमारी कभी मुलाकात नहीं हुई लेकिन उन्होंने सहृदय, सदाशय आत्मा की तरह हम लोगों को मुश्किल से निकाल लिया।
कभी उनको धन्यवाद कहने का भी मौका हाथ नहीं लग पाया।

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Sunday, November 8, 2009

रहस्मय चांदनी रात के सहयात्री

वह भी कोई देश है महाराज, भाग-13रात को गौहाटी लौटते हुए रास्ते में नान्गपो से पांच किलोमीटर पहले हम लोगों की जीप खराब हो गई। कोई दस किलोमीटर पहले से ही वह धुंआ फेंकते हुए वह पहाड़ी रास्ते पर घोंघे की तरह रेंग रही थी लेकिन हममें से ज्यादातर नशे की उच्चतर अवस्था में लगातार चहक रहे थे इसलिए पता जरा देर से चला। असम और मेघालय दोनों राज्यों में उग्रवादी जितने सक्रिय थे उससे हजार गुना भयग्रस्त आती-जाती गाड़ियों के ड्राइवरों के दिमाग थे इसलिए अलग-अलग आकार प्रकार के बैग, कैमरे और स्टैंड टांगे आठ-नौ युवा लोगों के गिरोह को लिफ्ट मिलने का कोई सवाल ही नहीं था।
आधी रात को भी सड़कों के किनारे अनानास, संतरे और केले की दुकानें खुलीं थीं। इक्का दुक्का ढाबों में ड्राइवर खाना खा रहे थे। वे अपने आर्डर नेपाली किशोरियों के हाथ पकड़ कर देते थे और उनके गालों पर चिकोटी काटना भोजन के बीच का विराम था। घनघोर जाड़े में सिर्फ टी-शर्ट पहने, लुंगी की तरह शाल लपेटे ये लड़कियां जिस सहजता से खिलखिला रही थीं, वह उनके कुछ और होने की संभावना के बारे में सोचने को उकसाता था। मैने एक लड़की से जान पहचान बढ़ाने की कोशिश की तो नशे में गाफिल मोहनन दादा-आं अचानक चैतन्य होकर चिल्ला पड़े और मुझे खींच कर ढाबे से बाहर ले आए, "बाहरी लोगों से वो लोग प्रोभोक हो जाएगा।"
"नेपाली लोग तो खुद बाहरी है, बाहरी से कैसे प्रोभोक होगा?"
"माई डियर तुमको सिर्फ नेपालिन दिखाई दे रहा है। हम लोकल ड्राइवर लोग का बात कर रहा है।"
सामान पीठ पर लादकर अंधेरे में पैदल चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। पहाड़ियों की गझिन हरियाली के ऊपर फीका सा चांद बेहद रहस्यमय लग रहा था। केले, नारियल, सुपारी और बांस के जंगल की सिर्फ ऊपरी पत्तियां चांदनी में चमक रही थी, नीचे गाढ़ा अंधेरा था। इस चांदनी का असर असामान्य था, रह-रह कर आधी रात की पैदल चढ़ाई की मुश्किल के उस पार ले जाने वाला। नान्गपो में एक टैक्सी वाला बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ। हम लोग गौहाटी पहुंचे तो सूरज निकल रहा था।
अगले दिन और उसके बाद अचरज था। अनिश्चय पर उतराता भय था और एक नई यात्रा थी। बाहर नहीं अपने भीतर, स्मृति की यात्रा।
शिलांग से लौटने की सुबह पूर्वोत्तर के इकलौते बडे़ हिन्दी अखबार पूर्वांचल प्रहरी में मैने अपनी रपट छपी देखी जबकि मैने वहां अपना लिखा हुआ कुछ नहीं भेजा था। उसके संपादक सत्यानन्द पाठक से मुलाकात जरूर हुई थी। यह जंगलात महकमें के असम के सबसे बड़े ठेकेदारों में से एक और समाज सेवी जी एल अग्रवाला का अखबार था जो अपने मालिक की ठसक से अपने ही अंदाज में चलता था। मैं कयास लगा रहा था कि आखिर मेरी लिखी रपट पूर्वांचल प्रहरी के दफ्तर में कौन ले गया होगा तभी दोपहर में दीघाली पुखुरी के किनारे टहलते हुए शाश्वत ने बुदबुदा कर कहा, "पैसा खत्म हो गया है, अब एकदम नहीं है।"

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Saturday, November 7, 2009

जहां सूर्य स्त्री है और चंद्रमा पुरूष

वह भी कोई देश है महाराज, भाग-12
शिलांग में एक नए दिल्ली विरोधी आंदोलन की हलचल थी। राजनेताओ के भीषण भ्रष्टाचार, दलबदल और उग्रवादियों के खून-खराबे से डरे खासी समाज पर इसका असर होता दिख रहा था। इस आंदोलन को राज बहाली के लिए लड़ने वाले प्रतिबंधित खासी संगठन हाईन्यूत्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल (एचएनएलसी) का समर्थन हासिल था। जमाने बाद जर्जर अंगरखे, पगड़ियां और जंग लगी तलवारें निकाली जा रही थीं। उसी हफ्ते मेघालय के सबसे बड़े राज्य खीम का दरबार लगा, वहां के राजा बालाजीक सिंग सीयेम ने पारंपरिक जनतंत्र बहाल करने के लिए राजनीतिक क्रांति का नारा दिया। एक छोटे राज्य नांगस्टाइन का भी दरबार लगने वाला था जहां के राजा सीयेम सिब सिंग ने 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल के राज्य अधिग्रहण प्रस्ताव पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था और इसी कारण उप राजा विक्लिफ सीएम ने अपना जीवन निर्वासन की हालत में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में बिताया। मेघालय के उग्रवादी उनको खासी जनजाति की स्वाधीनता के लड़ने वाले शहीद का दर्जा दे चुके हैं। नांगसाईच और राजब्राई दो राज्यों ने विलय अस्वीकार कर दिया तो डिप्टी कमिश्नर और अंग्रेजों के डोमिनियन एजेंट जीपी जॉरमन ने धमका कर उनसे हस्ताक्षर कराए। वैसे यह एक तथ्य है कि जिन दिनों बड़े-बड़े महाराजा पनाह मांग रहे थे, इन दोनों बेहद लघु राज्यों ने सबसे बाद में भारत का हिस्सा होना स्वीकार किया था। अब लग रहे दरबारों में भाषण हो रहे थे कि भारत ने खासी राज्यों पर जबरन कब्जा कर लिया है।

लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे कि पंद्रह जनवरी 1947 को असम के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले राज्यों के अधीन होने चाहिए थे। बाद में धोखे से इन राज्यों को संविधान की छठी अनुसूची में डालकर पारंपरिक ढंग से प्रशासन चलाने के लिए खासी, गारो और जयंतिया जिलों में स्वायत्तशासी परिषदों की स्थापना कर दी गई। इस कारण सीयेम नाम के राजा रह गए हैं और अब परिषदें उन्हें मोहरों की तरह हटाती और बिठाती रहती हैं। 1998 के लोकसभा चुनाव में अपने पैर जमाने के लिए भाजपा ने पहली बार वादा किया था कि वह अकबरी समझौते को मूल रूप में लागू कराएगी। अगले चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस यानि घड़ी छाप पार्टी बनाकर अस्तित्व के लिए जूझ रहे गारो जनजाति के पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा ने वादा किया कि वे राज बहाली के लिए संविधान में संशोधन कराएंगे। तभी संविधान समीक्षा आयोग बना और इस मुद्दे को ढंग से हवा मिल गई।

परंपरागत कानून, रिवाजों और पुरानी संस्थाओं की रखवाली के लिए जो स्वायत्तशासी जिला परिषदें बनीं उनका तेजी से सरकारीकरण हुआ और मंत्रियों, विधायकों की नकल में वहां भी तिकड़म, भाई भतीजावाद का बोलबाला हो गया। मेघालय के दलबदल के उस्ताद नए नेताओं की नर्सरी ये जिला परिषदें ही हैं जिन्हें राजाओं के चुनाव को मान्यता देने और हटाने का अधिकार है। उनका ब्रह्मास्त्र संयुक्त खासी, जयंतिया (नियुक्ति और उत्तराधिकार) अधिनियम, 1959 है। जो राजा उनके माफिक नहीं बैठते हटा दिए जाते हैं। जिला परिषदों का कहना है कि ज्यादातर राजा पियक्कड़ और भ्रष्ट हैं। उन्हें संविधानिक मान्यता मिली तो वे अपनी हांकने वाले जमींदारों में बदल जाएंगे। वे पैसों के बदले जमीनों के पट्टे गैर आदिवासियों को देने को तैयार रहते हैं। इन अंगूठा टेक राजाओं का टैक्स वसूली और हिसाब किताब का जो तरीका है, उसमें धांधली की गुंजाइश हमेशा रहती है। इस झगड़े के अलावा सबसे बड़ा पेंच यह है कि आज के मेघालय पारंपरिक, भारत सरकार का और जिला परिषद का तीन कानून एक साथ चलते हैं, जिनके मकड़जाल में लोग झूलते रहते हैं। मिसाल के लिए राजधानी शिलांग के मोहल्लों में भी पुलिस पारंपरिक मुखियाओं की इजाजत लिए बिना घुस नहीं सकती। उग्रवादियों की धर-पकड़ में यह सबसे बड़ी बाधा है।

राजा के घर के बाहर दोपहर की चटक धूप में भी ठंडी हवा के दांत किटकिटा रहे थे। जिन घरों के बित्ता भर भी लाननुमा जगह थी, संतरे लदे हुए थे। सुंदर, पीली लड़कियां दुकान की मालकिन के गरूर से कारोबार चला रही थी। मातृसत्ताक समाज में पले होने का आत्मविश्वास उनके चेहरों पर था। दिलचस्प यह है कि खासी लोक कथाओं में सूर्य स्त्री है और चंद्रमा पुरूष। खासी पुरूष वाकई अपनी स्त्रियों की रोशनी में ही दिखाई पड़ते हैं। यहां संपत्ति का हस्तांतरण सबसे छोटी बेटी के नाम होता है। पुरूष को बैंक से कर्ज लेना हो तो गारंटी औरतों की ही चलती है। लेकिन ये सुंदर लड़कियां मुस्काने तक तो ठीक थीं, लेकिन उनके हंसते ही मेरे भीतर भय की लहर उठने लगती थी। इनमें से ज्यादातर के दांत मसूड़ों के ऊपर लाल रंग की आरी की तरह खुल जाते थे जो बचपन से क्वाय (मेघालय का तामुल) खाने के कारण वे घिस चुके थे। इन दांतों को धारण करने वाले सुंदर मुंह पौराणिक कथाओं की खलनायिकाओं की याद दिलाने लगते थे।

खासी मोनोलिथराजा से मिलने के बाद नए राजा यानि मुख्यमंत्री ईके मावलांग से मिलना जरूरी था ताकि जाना जा सके कि राज बहाली आंदोलन के बारे में उनकी सरकार क्या सोच रही है। उनके गृहमंत्री टीएच रंगाद हिमा मिलियम के दरबार मे जाकर पुराने राजा के प्रति अपनी निष्ठा सार्वजनिक कर आए थे। मुख्यमंत्री कैबिनेट की मीटिंग में थे और हम लोगों को शाम तक लौटना था। सटीक जुगाड़ की तलाश में टिप्पस लगाते हुए अंग्रेजी के अखबार मेघालय गार्जियन के दफ्तर एक अत्यंत शालीन, पियक्कड़ रिपोर्टर फ्रैंक से मुलाकात हो गई। फ्रैंक का बड़ा भाई मंत्री की हैसियत से कैबिनेट मीटिंग में अंदर था। उसने तुरंत एक फोन करके इन्टरब्यू का इंतजाम कर दिया। मैने पहला मुख्यमंत्री देखा जिसने कैबिनेट की मीटिंग में प्रेस को बुला लिया। पूर्वोत्तर में हिंदी पट्टी के नेताओं की तरह सामंती ठसक और चोंचलेबाजी बहुत कम है। उनसे अब भी सहज ढंग से मिला जा सकता है। मावलांग ने सर्तकता से कहा कि पारंपरिक राजाओं और संस्थाओं का अस्तित्व वे मानते हैं और उन्होंने कभी उनमें हस्तक्षेप नहीं किया। गृहमंत्री रंगाद का कहना था कि वे दरबार में मंत्री के रूप में नहीं अपने समुदाय के मुखिया की हैसियत से गए थे। (जारी)

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